Category Archives: Daughter

व्हील चेयर…

स्कूल जाने की ख़ुशी उसके चेहरे से साफ़ झलकती है जो की आम तौर पर बच्चों में कभी कभार ही देखने को मिलता है, हर रोज वो बस स्टॉप से थोडा सा आगे बढ़ कर अपने भाई या पिताजी के साथ स्कूल के गाड़ी का इंतज़ार करते दिख जाती है, मासूम सा चेहरा बड़ी बड़ी आँखें, लम्बे से बाल, भूरे रंग का चेक वाला बुशट और गहरे भूरे रंग का स्कर्ट, रोड के किनारे होने की वजह से आते जाते गाड़ियों की हवाओं से उस छोटी बच्ची के बाल हर रोज खराब हो जाया करते थे, लेकिन अपनी धुन में चुप चाप बैठी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता,  जब कभी बाकी बच्चों को देखती की वो लोग किसी न किसी के साथ हँसते खेलते दौड़ते हुए स्कुल जा रहे हैं उसके चेहरे की मुस्कराहट और ज्यादा बड़ी हो जाती ।
कभी कभार ही कुछ बोलते हुए देखा कभी कभार ज्यादा हंस भी लेती थी। वैसे तो मुस्कराहट उसके चेहरे पर जैसे एक नकाब की तरह चिपकी हुयी साफ़ दिखती है, लेकिन नकाब आखिर नकाब ही होता है, चेहरे सच्चे हो या झूठे वो आखिर छुपे ही तो  होते हैं उस नकाब के पीछे। ज्यादा कुछ तो पता नहीं उसके बारे में लेकिन देख कर जितना महसूस होता है उससे तो यही लगता है की वो अपने ज़िन्दगी से खुश है, पांच-सात साल की उम्र में उसे जितना पता है ख़ुशी के बारे में वो शायद इतना ही की जब कभी उसके हाथ में अगर कभी चॉकलेट या कभी कुरकुरे का पैकेट दीख जाता तो उसके चेहरे की ख़ुशी और ज्यादा झलकती थी। हर रोज उसी बस स्टॉप पर स्कुल बस का इंतज़ार करते दिख जाती थी पता नहीं साथ में उसके पिता थे या भाई या कौन मुझे ये नहीं पता, पिछले कुछ दिनों से वो नहीं दिख रही थी, एक दिन दो दिन तीन दिन और ऐसे ही 5-6दिन गुजर चुके। कुछ अजीब सी बेचैनी होने लगी उसके बारे में जानने को लेकिन सिवाय उसके और उसके साथ वाले इंसान के चेहरे के अलावा मैं कुछ भी नहीं जानता था लेकिन आखिर वो बच्ची गयी कहाँ अचानक से? पूरी दुनिया से बेखबर अपने में मशगूल दिखने वाला वो चेहरा … करीब करीब जैसे हर रोज उस चेहरे को देखने की आदत सी हो गयी थी । जब कभी मैं उस बस स्टॉप से गुजरता हु तब तब मेरी नजरें खुद ही उसे ढूंढने लग जाती हैं।

आज करीब दो महीने से ऊपर हो चुके हैं
अब नहीं दिखाई देती है वो …
आज मेरे बगल में उसी स्टॉप पर एक आदमी आ कर बैठा, चेहरा कुछ जाना पहचाना सा , हाँ ये वही हैं उसके साथ वाले, एक अजीब सी ख़ुशी महसूस हुयी उन्हें देख कर, कंधे में खादी का झोला लटकाये कुछ सोचते हुए वो दुसरी दुनिया में मशगूल दिख रहे थे “बुरा ना मानें तो आपसे एक बात पूछूँ वो बच्ची जो आपके साथ बस स्टॉप पर रोज होती थी वो कुछ हफ़्तों से दिखाई नहीं दे रही?” एक झटके में उन्होंने अपना अजीब सा सवालिया चेहरा मेरी तरफ घुमाया  जैसे मुझसे पूछ रहे हों की आपको उससे क्या मतलब.. उसकी तबियत ठीक नहीं रहती अब बॉम्बे है अस्पताल में… बात हुयी थोड़ी और तो पता चला..
वो जब पैदा हुयी थी तब से ही उसे कैंसर था और अब उसकी तबियत काफी ज्यादा ख़राब हो गयी थी … ऊपर वाला भी कभी कभी कहीं मुसीबतों का पूरा अम्बार बनाता है एक साथ किसी के लिए..
कोशिश तो काफी की उसे भुलने की लेकिन जब भी उस बस स्टॉप से गुजरता हु उसका चेहरा याद आ जाता है।। एक अजीब सा लगाव हो चूका था उससे .. मासूम सा गोल चेहरा बड़ी बड़ी आँखें.. हरदम हमेशा सब ताकते हुए जैसे अपनी अनजान ख़ुशी में एक जगह या फिर एक ज़िन्दगी की तलाश… सबको बस ताकते हुए कभी इधर कभी उधर अपने उम्र के बच्चों को देखते हुए उसके चेहरे की वो अजीब सी ख़ुशी और वो व्हील चेयर…
और हम सब अक्सर सोचते हैं कि हमें ही सबसे ज्यादा ज़िन्दगी में परेशानियां हैं।
जिंदगी भी अजीब है,
बिन पहचान भी कुछ पल दिल के करीब हैं,
जिंदगी भी अजीब है।।
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दीदी

साल 1996 का कोई दिन है दो टॉफ़ी लेकर आये हैं पिताजी, एक रूपये वाली कीस्मी बार, हम उसे टॉफ़ी ही कहा करते थे, लेकिन दोनों  मुझे ही चाहिए..
मजाल किसी की जो मुझसे छीन ले..
हाँ एक है घर में पापा ने तो कहा था की उसे भी दे देना एक..
लेकिन हम क्यूँ दें…
हमारा दोनों खाने का मन है और हम दोनों ही खायेंगे ..
टेबल पर टॉफ़ी रख कर मैं बाहर से लौटा तो एक टॉफ़ी गायब थी…
जरुर उसी ने लिया होगा…
अन्दर जाके देखा कमरे में  टेबल पर रखा था दूसरा टॉफ़ी और कुर्सी पर बैठ वो पढ़ रही थी..
ये टॉफ़ी मेरा है पापा ने मेको दिया था …
पापा दो लाये थे तो एक मेरा हुआ ना …
अरे ऐसे कैसे आपका हुआ…
नहीं …. पापा ने मुझे दिया था तो दोनों मेरे हुए…
अच्छा हम तो नहीं दे रहे ..
आपसे मांग कौन रहा है दीदी..
ये कह के टॉफ़ी उठाया और मैं फुर्र से फरार ….
दीदी पीछे पीछे और मैं आगे आगे …
लेकिन मैं जल्द ही पकड़ा गया  और जैसे ही मेरे हाथ से वो टॉफ़ी छिना गया वैसे ही मेरा रोना शुरू…
रोना ऐसा जैसे दुनिया में मुझसे ज्यादा किसी को दुःख ना हुआ हो …
दीदी का चेहरा देखने लायक था …
चुप हो जा ना , उनका इतना कहना था और मेरे रोना और तेज…
अच्छा लो ये लो खाओ तुम ही .. अपनी टॉफ़ी मुझे देते हुए कहा ..
लेकिन फिर भी मेरा रोना कम नहीं हुआ …
पहले चुप हो जाओ… चुप एकदम … ये लो ..
लेकिन मैं चुप होने का नाम नहीं ले रहा था..
दौड़ते हुए दीदी अन्दर कमरे में गयी और हर बार की तरह ढेर सारा किस्मी बार और ले कर आयी ..
ये लो अब एकदम चुप…
इतने सारे टॉफ़ी ???
दीदी ने वो सब मेरे लिए ही जमा कर के रखा था ये मुझे पता था..
मुझे तो याद नहीं की उन्होंने कभी एक टॉफ़ी शायद ही खायी भी होगी , क्यूंकि हर बार मैं जब भी रोता तो मुझे ढेर सारे टॉफ़ी दीदी लाकर देती थी..
वो कभी नहीं खाती थी हर बार वो जमा कर के रखतीं थीं और मैं हर बार जब भी ज्यादा रोता था वो अपना टॉफ़ी बैंक मुझे लाकर दे देतीं थीं..
प्यार दुलार का एक अनोखा उदाहरण होता है ये रिश्ता..
जो की अपने आप में अनूठा होता है…
वो चाहे परीक्षा में नंबर कम आने पर मम्मी से छुपाने में साथ की बात हो या फिर कोई लड़की पसंद आ गयी तो उसके साथ सेटिंग करने की बात हो..
और राखी का दिन कैसे भूल सकता हूँ , मम्मी से लड़ कर काफी अच्छा पेंटिंग बॉक्स या फिर कुछ भी अच्छा सा दीदी को गिफ्ट करता था .. और वो गिफ्ट अगले ही दिन से मेरा हो जाता था 🙂 दीदी मुझे ही वापस दे देतीं थीं …
बहन से अच्छा कोई दोस्त कभी हो ही नहीं सकता … कभी नहीं…
आज 8 साल हो गए दीदी से राखी बंधवाये.. बड़ा बुरा महसूस होता है हर साल … हाँ हर साल राखी बिलकुल आ जाता है, समय पर लेकिन जिंदगी के भाग दौड़ में क्या हम इतने बड़े हो गए की अपना जमा पूंजी हमें बिना स्वार्थ के देने वाली अपनी बहन के लिए एक दिन समय नहीं निकल सकते…
भारी मन से लिखते हुए, सभी भाई-बहन का प्यार सदा बरक़रार रहे.. इसी उम्मीद और दुआ के साथ रक्षाबंधन की शुभकामनायें।।
जाते जाते थोड़ा मुस्कुरा लेते हैं…
इस साल राखी पर दीदी को दो बोरी प्याज क्या गिफ्ट कर दीया इनकम टैक्स वालों ने दोपहर में ही घर में छपा मार दिया… #महंगाई

Jajba

सवेरा होने से पहले ही उठ जाना, स्कूल जाने के लिए तैयार होना और फिर उसकेपिताजी उसे स्कूल तक छोड़ने जाते थे हर रोज .. केवल इस लिए नहीं की वो अपने माँबाप की एकलौती बेटी है बल्कि इस लिए क्यूंकि वो नहीं चाहते की उनकी बेटी कोकिसी तरह की दिक्कत हो स्कूल जाने में , पहली से दसवी और फिर बारहवी सेकॉलेज तक भी ये सिलसिला चलता रहा , बाकी लोगों की तरह वो भी अपनी बेटी कोस्कूल छोड़ने जाया करते थे स्कूल से जब कॉलेज गयी तब थोड़ी दुरी कम हो गयी , घरसे बस मेन रोड तक ही छोड़ने जाते हैं, मिरांडा हाउस में चुनी गयी है आज वो,गाडी की औकात तो नहीं थी, अपनी गरीबी छुपाने के लिए जब स्कूल छोड़ने जाते थेतब भी बस स्कूल से पहले वाले मोड़ तक ही छोड़ने जाते थे, लेकिन जितनी थी उतनेमें ही सब खुश थे बाप बेटी सब खुश ….एक चीज जो आज तक नहीं थी वो ये की वो कल भी अपनी बेटी को साइकिल पे बिठा करले जाते थे और आज भी साइकिल से ही ले जाया करते …
बेटी भी ऐसी की कभी अपनेपिता से कोई भी शिकायत नहीं की …. और जिस दिन पिता की तबियत ख़राब हो उस दिनदोनों की अपनी अपनी जिद .. पिता चाहता की मैं पहुंचाने जाऊं, और बेटी चाहतीकी पिता जी आराम करें , पिता ने तो बस इतनी सी कोशिश की थी की अपनी बेटी कोएक कामयाब इंसान बना सके , आज के समय में दिल्ली जैसे शहर में आपकी बेटी जवानहोकर सुरक्षित रहे तो ये भी खुद अपने आप में उपलब्धि है।
आज उस पिता की ख़ुशीकी सीमा नहीं रही जब उन्हें पता चला की उनकी लाडली 26 साल के उम्र में IPSमें चुनी गयी है दिल्ली जल बोर्ड में चपरासी की नौकरी करने वाले इस इंसान नेसाइकिल से ही अपनी बिटिया की जिंदगी बनायी।
ऐसे जज्बे को सलाम ….